Tuesday, December 8, 2009

तू चिंगारी बनकर उड़ री दाल दाल मैं पात बनू,
तू बन जा हहराती गंगा मैं झेलम बेहाल बनू.
ये था कल का अपना सपना जिनमें सबकुछ लगता अपना,
अब की बात बदल चुकी है अपना सबकुछ दिखता सपना.
की न मैं झेलम बनूँ कभी भी तुम भी गंगा मत बनाना,
यह न कल को दिखने वाले चाँद दिनों का यह अंगना.
वृक्ष लगायें, वृक्ष बचाएं.
-इन्द्र भूषण "साहिल"

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